खुदसे अंजान

हर चेहरा लगता यहा है साजिश कोई
हर निगाहों में बसता है राज़ कोई
ज़र्रे ज़र्रे में छूपी है आहट किसी की
गुमनामी ही है सच्चाई उसी की
महसूस होती जो पर दिखाई न देती
रंजिसो में बसी है एक कहानी ऐसी
जानकर भी अनजान है यहा सभी
ऐसी ही है कुछ पहचान उस की
खामोशी छा जाती जिसकी मौजूदगी से
थम सा जाता है कतरा कतरा
काँप उठता है मौसम भी मगर
अनजान है वो खुदसे ही कही
अनजान है वो खुदसे ही कही

-Sia

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