8th july 2008

हेलो दोस्तो एक बार फिरसे आपके सामने हाजिर है आपका अपना दोस्त आर्यन सुवाड़ा । आप सोच रहे होंगे कि यह दस साल पहले की तारीख टाइटल में क्यों लिखी है ? तो मैं आपको बता दूँ की यही वो दिन है जिसने मेरी पूरी जिंदगी बदल दी । मुझे आम बच्चे में से खास बच्चे मैं तब्दील कर दिया । दस साल पहले इसी दिन मैंने एक ऐसा सफर शुरू किया था जिसमें हर दिन एक नया रोमांच था , जिसकी यादे आज भी दिल में घर किए हुए है और हर दिन यह यादे मुझे रुला जाती है और यह यादे मेरे मरने तक मेरे दिल में हमेशा के लिए बसी रहेगी । यह सफर था मेरी नवोदय का । हा दोस्तो , आज से दस साल पहले मैंने और मेरे साथ 80 बच्चो ने आज से दस साल पहले यानी कि 8थ जुलाई 2008 के ही दिन 6वी कक्षा से अपना जवाहर नवोदय विद्यालय-अलियाबाड़ा (जामनगर) का सफर शुरू किया था ।

आज एक बार फिरसे आप सभी को अपनी कलम से में समय यात्रा कराने वाला हु । तो समय यात्रियों अपनी सीटबेल्ट कसके बांधियेगा क्योकि जिस दिन की हम यात्रा करने वाले है उस दिन में सबकी आखो मैं आंसू थे और हमारे अंकित भाई की आखो में आंसू की नदी ।

8थ जुलाई 2008

मैंने और मेरे भाई राकेश ने अपना सामान लेकर गोप जाम से अलियाबाड़ा का सफर ट्रैन से किया । हमारे साथ मेरी मम्मी और नानी दोनों साथ थे । घरवाले खुश थे और मेरे मन में था की यह नवोदय क्या बला है । करीब 12 बजे हम अलियाबाड़ा के रेलवे स्टेशन पर उतरे । फिर चलकर जाने लगे । हमे चलते हुए करीब 15 मिनटों बाद नवोदय का गेट दिखा , जिसके ऊपर अर्ध्वकार की प्लेट टंगी दिखी , जिसपर बड़े अक्षर में लिखा था , “जवाहर नवोदय विद्यालय, अलियाबाड़ा ” उसके ऊपर प्रज्ञान ब्रह्म लिखा लोगो था । फिर हम अंदर गए तो हमारा स्वागत नवोदय के पेड़ो और पौधों ने किया जो राइट तरफ एक कतार में लगे हुए थे और दूसरी तरफ सुखी गीली मिट्टी का मैदान था । मैं पेड़ पौधों को देखते हुए बढ़ रहा था तभी मैने एक पैड पर टंगी प्लेट देखी जिसपर राजीव गांधी पार्क लिखा था , और फिर मैंने देखा कि हर पेड पर एक प्लेट है जिसपर उसके नाम और उसके वैज्ञानिक नाम लिखे थे । फिर आगे चलकर 3 रास्ता सड़क पर एक बोर्ड था जिस में पूरे कैंपस का नक्शा था । फिर हम एक बड़े मैंदान से होकर मैन बिल्डिंग पर पहोंचे । यही हमारी स्कूल बिल्डिंग थी जिसके बहार एक तरफ अब्राहम लिंकन का खत लगा हुआ था जिसे मैंने चौथी कक्षा मैं पढ़ा हुआ था । मैंने बिल्डिंग मैं प्रवेश किया ।अंदर की चारो तरफ की दिवालो पर सुविचार के बोर्ड टंगे हुए थे और कुछ तस्वीरें और कुछ नोटिस बोर्ड थे । सामने एक बड़ा सा डेस्क था और चारो दिवालो से घिरा हुआ एक मैदान था जो कि हमारी प्राथना सभा का मैदान था । मैंने देखा कि एक दीवाल पर तैलीय चित्र था जो द्वारिका के कृष्णा मंदिर का दृश्य था जो कि बहोत पुराना था , क्योंकि कई जगह से वह चित्र मिट चुका था । तो दूसरी तरफ हमारे हिंदी साहित्य के उपन्यास सम्राट प्रेमचंद की तस्वीर बनी थी । फिर वहां से हमे एक चिट मिली जिसपर अरावली जूनियर लिखा था और साथ में कुछ और था पर याद नही । मेरे खयाल से गद्दा और खाने की डिश लिखी थी । फिर हमने गद्दा ग्लास खाने की डिश कलेक्ट की और अरावली जूनियर की तरफ बढ़े । अरावली जूनियर एक हाउस का नाम था । वैसे ही यहा के हाउस के नाम अलग अलग भारत देश के पहाड़ों के नाम पर रखे गए थे जैसे कि अरावली , शिवालिक , नीलगिरी और उदयगिरि । जब मैं अरावली हाउस पर पहोंचा तो वहां का दृश्य देख मैं थोड़ा हैरान था । क्योंकि वहां भरत विलाप चल रहा था। हर बच्चा रोये ही जा रहा था । फिर मुझे एहसास हुआ कि यह इस लिए विलाप कर रहे है क्योकि दिन के अंत में माता पिता हमे यही छोड़कर जाने वाले है । मैंने उनलोगों के तरफ से ध्यान हटाया क्योकि उनका रोना मुझे भी रोने पर मजबूर कर रहा था । मैंने हाउस के अंदर जाके देखा । वहां दो विंग थी ‘ अ ‘ विंग और ‘ब’ विंग में विंग में गया तो अपनी जिंदगी में पहली बार मैंने डबल बेड देखा । बेड के सामने समान रखने के लिए कुछ पत्थर के खाने बने हुए थे और एक टेबल फैन जो कि रस्सी के खिंचने पर चलता था । मेरी कमनसीबी थी कि दोनों विंग के बेड फुल हो चुके थे इस लिए हमे सी विंग में शिफ्ट किया गया । हमारे साथ तीन और लड़के थे जिनका नाम था धनिष भायाणी, अर्जुन गरचर और महेश गरचर । मम्मी ने बेड ठीक किया । हमारे सामान को बाहर निकाला । यह सब करते करते मम्मी की ट्रेन का टाइम हो गया । हम दोनों भाई को छोड़कर नानी और मम्मी हमे छोड़कर चले गए । शायद नानी हमे अकेला छोड़ना नही चाहती थी इस लिए वह रोने लगी । मम्मी ने उन्हें समजाया और फिर वह चले गए । हम दोनों भाई दुखी थे पर हम रोये नही । हम दोनों भाई अपनी रूम की तरफ बढ़े तभी मैंने देखा कि दो लड़के जो बच्चे रो रहे उनको देखकर हस रहे थे । जहाँ तक मुझे याद है वह मितुराज और किशन या सारंग था । हमदोनो भाई विंग मैं गए और फिर धनिष और अर्जुन से बाते की । ज. न. वी . जामनगर का सबसे पहला मेरा दोस्त धनिष था । बाते करते करते हम कब सो गए पता ही नही चला । करीब 3 बजे दो बच्चो ने हम पाचो को जगाया । उन लड़को ने हमे रिमीडियल स्टडी के बारे में बताया । हम पहले ही दिन लेट हो चुके थे । फिर हम भागे भागे स्कूल बिल्डिंग गए । वहां मैंने देखा कि सारे बच्चे नीचे बैठे थे और अपना नाम लिखवा रहे थे । हम भी उन बच्चों के साथ बैठ गए । हम सभी को ए क्लास और बी क्लास में डिवाइड किया गया । मुझे ए क्लास मैं डाला गया और मेरे भाई को बी क्लास में डाला गया । फिर हमें योगिनी मैडम ने जो कि हमारे संगीत अध्यापिका थे लाइन में ए क्लास में बिठाया गया । फिर मैडम ने हमे नवोदय की प्राथना सिखाई । फिर हमे गीत गाने को कहा गया तो मैंने उठकर वंदे मातरम और राष्ट्र गान गाया । इतने में क्लास खत्म हो गई । फिर हम सब मैदान में खेलने चले गए । मैंने लाल रंग की टी – शर्ट और काले रंग का लोअर पहना जो कि हमारा रिमीडियल यूनिफार्म था । 5 बजे । पी.टी सर ने अटेंडेंस ली और मैदान की चारो और दो राउंड दौड़ने को कहा । दो राउंड के बाद हमे खेलने के लिए छोड़ दिया गया । फिर में एक अच्छी सी बेंच ढूंढकर बैठ गया। और जो खेल रहे थे उनको देखने लगा ।

फिर शामको मुझे पता चला कि हमारे लिए चार केप्टन को नियुक्त किया गया था, जो थे राज मजेवड़िया, निषित कनानी ,पार्थ भिमानी और दिव्यराज जाडेजा । फिर शामको को हमारे हाउस मास्टर नागदा सर और राहुल बंड सर आये थे । उन्होंने हमसे बात की और हमारी अटेंडेंस ली और सबने अपना अपना परिचय दिया । मुझे यह भी पता चला कि कोई नीरव भराडिया पहले ही दिन अपना पैर तुड़वाकर घर जा चुका है । फिर रात को उप आचार्य प्रसाद सर ने हमे छात्रा भोजनालय में बुलाया और हमे हमारे नाम पूछे और नवोदय के नियम समजाये और बहोत सी बातें बताई ।

अगले दिन सुबह 5 बजे से नवोदय में मेरा और मेरे साथ 80 बच्चों का सफर शुरू हुआ । एक ऐसा सफर जिसमें कई उतार चढ़ाव थे जहाँ न कोई जाति थी न कोई धर्म सिर्फ एक ही पहचान थी और वो थी “नवोदियन”। शुरुआत में यह हमे जेल लगी थी और हमे सात साल की जेल हुई है यह लगता था पर धीरे धीरे यह जेल घर बनता गया और जब इस जेल को अलविदा कहने की बारी आई तब भी आखो मैं आंसू थे । जिंदगी मैं बहोत कुछ पाने के चक्कर में जिंदगी हमसे बहोत कुछ छीन भी लेती है और रह जाती है बस उनकी यादे जो चहरे पर मुस्कुराहट के साथ आँखों को नम कर जाती है और नवोदय उसी मीठी यादों का समंदर है जिसमे हम अब भी डुबकी लगाकर आखो को नम कर लेते है । इन यादों में कई घटना शामिल है वो जय पटेल का हस्ताक्षर अभियान हो या संजय का गुलकन्द हो या प्रसाद मैडम की डांट हो, वो ऐ क्लास और बी क्लास का झगड़ा हो या बॉयज गर्ल की बेवकूफो वाली फाइट और तुम सबका मुझे ठंडी कहना यह सब मेरे दिल के किसी कोने में आज भी मौजूद है हा आज हम सब अपनी अपनी जिंदगी मैं व्यस्त है कोई खुश है तो कोई अपनी मुकाम पाने के लिए लड़ रहा है पर जब भी कुछ पल हमारे लिए मिल जाते है तब यह सारी यादों के समंदर मैं तैर लेते है ।

मेरा नवोदय जामनगर का सफर सिर्फ 5 साल का था पर यह 5 साल मेरी जिंदगी के अनमोल 5 साल है कई मीठे और खट्टे पलो को हमने साथ जिए है नवोदय के दोस्त दिल और दिमाग दोनों पर असर छोड़ गए । हम सबका अनुभव सबके साथ हर पल अच्छा नही था कभी साथ मसीन हसे तो कभी लड़े भी अगर इन 5 सालो में कोई भी गलती मुझे हुई हो तो दिलसे माफी चाहता हु और अगर किसी मोड़पर हम मिल जाये तो नजरे मत फिराना ओय ठंडी कहके गले लग जाना मिस यु यारो एंड मिस यू नवोदय ।

ક્યાંથી હોત ?

અલગ હોત આ જિંદગી જો એમાં ઇ ન હોત
આ દર્દ જિંદગી ભર નું ક્યાંથી હોત ?

હસું છું રડું છું જેના લીધે આજે પણ,

વિસરવાને કે યાદ કરવાને ઇ યાદો ક્યાંથી હોત?

પહેલું કદમ રાખ્યું ન હોત તે દિવસે અંદર તો ,
આખરી ઇ દાગ મુજથી ભરાયું જ કેમ હોત?

વિચારો માં એના ખોવાઈ જાઉં છું દરરોજ પણ
વિચારવાને ઇ બધા પછી વિચારો ક્યાંથી હોત ?

મલત નહિ ક્યાંય એવા દોસ્તો ફરી જીવન માં
દોસ્તી ના ઇ બધા કિસ્સાઓ ક્યાંથી હોત ?

દુઃખ માં તો આસું પણ છોડી સાથ ઢાળી જાય છે,
આખો ના કિનારે એના વિન ‘કરણ ‘ આંસુ ક્યાંથી હોત?

Article by – Aryan suvada

Poem by – karan chavada

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