गोप माइंस

हेलो दोस्तों ! एक बार फिरसे आपके सामने हाजिर है आपका अपना दोस्त आर्यन सुवाड़ा । हम इंसान भी कितने अजीब होते है , ऐसी चीजों से दिल लगा बैठते है जिनके पास दिल ही नही है । यहा तक कि वो हमसे बात भी नही करते पर वो हमसे दूर हो जाए या टूट जाए तो उसकी यादों में अश्क बहने लगते है ।आज मैं यह बात इस लिए कर रहा हु क्योकि हाल ही में मेरी मम्मी जिस कंपनी में माली का काम करती है उसी कम्पनी में कॉन्ट्रैक्ट बदलने से अचानक मेरी मम्मी और नानी की रिटायरमेंट की घोषणा हो गई और 1 तारीख तक यह घर हमे खाली करना है और इसी के साथ हमे इस गाँव को छोड़कर हमेशा के लिए दूसरे काम की तलाश में निकल जाना है । हमे इस बात का ज्यादा मलाल नही है कि मम्मी और नानी को अचानक रिटायर होना पड़ रहा है पर हमें इस बात का ज्यादा दुख है कि हमे गोप माइंस छोड़कर जाना होगा । जब यह बात मेरे दिमाग में आई तो एक पल के लिए मेरी आँखों के सामने से गोप की गलिया, सड़के , पहाड़, नदी मंदिर और आदि सब आ गया । मेरा परिवार 35 साल से इस गाँव मे बसा हुआ है । पहले मेरी परनानी उसके बाद मेरी नानी और उसके बाद मेरी मम्मी इन कंपनी में काम कर रहे है । हम इस गाँव से इस तरह जुड़ चुके है जैसे किसी पैड से उसकी जड़े । तो आज मैं आपको गाइड बनकर मेरे शब्दों से आपको मेरा गाँव दिखाऊंगा ।

गोप माइंस या गोप जाम यह दोनों नामो से मेरा गाँव जाना जाता है । मेरा गाँव गोप माइंस गुजरात के जामनगर जिल्ले के जामजोधपुर और लालपुर तहसील दोनों में बटा हुआ है । इस गाँव में न ही कोई बस अड्डा है पर इस गाँव से रोज सुबह और शाम 2 बस निकलती है जब कि यह गाँव जी. आर.एस. टी . सी. पर रजिस्टर तक नही है । साहित्यकार जिस तरह अपनी रचनाओं में गाँव के सौंदर्य को दर्शाते हैं वैसा ही मेरा यह गाँव है । यहा नदिया , पहाड़ , जंगल, गुफाएं, मंदिरे सबकुछ आपको देखने को मिलेगा ।

यह गाँव एक तरह से यहा बसी कंपनी डी. सी. सी. ने बसाया था जो कि एक सीमेंट कंपनी है , क्योंकि यहा पर सीमेंट के कच्चा माल पाया जाता है । 2002 में जब मैं मुंबई से यहा अपनी नानी के पास शिफ्ट हुआ था तो मुझे यह डर था कि इस गाँव में कैसे रह पाऊंगा । तब मुझे गुजराती तक नही आती थी पर यह एक ऐसा गाँव था जहाँ पर गुजराती लोगों से ज्यादा मारवाड़ी लोग बसे हुए थे । यह गाँव को कंपनी ने कॉलोनी सिस्टम में तब्दील किया हुआ है । इस गाँव की सबसे खास बात यह है कि यहा के चारो दिशाओं में शिवजी के ही मंदिर पाए जाते है । पूर्व में गोपनाथ मंदिर जो कि पहाड़ की चोटी पर बसा हुआ है । यहा पर हर साल शिवरात्रि पर लोग दूर दूर से दर्शन करने आते है । तो उत्तर में टपकेश्वर महादेव का मंदिर है जो असल में एक गुफा के अंदर है । यह मंदिर मुझे बहोत विस्मय करता है , क्योंकि इस गुफा में जो शिवलिंग है उसके ऊपर गुफा की छत से कुदरती पानी की बूंदे गिरती है और जहा से पानी की बूंद गिर रही वहां पर साँप के मुह की आकृति है । यह चमत्कार है या इसके पीछे कोई विज्ञानिक कारण है यह तो पता नही पर देखकर कोतुहल जरूर होता है । दक्षिण में नदी के किनारे पाच पिपली मंदिर बसा है जिसे बालाजी मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। गाँव के बीचों बीच अम्बे मा का मंदिर है जहाँ हर साल नवरात्रि होती है । इसी गांव में पांच पिपली के पास छोटा सा प्राथमिक स्कूल है जिसका नाम है बांगड़ प्राथमिक विद्यालय। जिसमे एक से लेकर सातवी तक पढ़ाया जाता है । में भी यही पर पाचवी तक पढ़ा हु । इस स्कूल की पढ़ाई इतनी अच्छी है की आसपास के गाँव के बच्चे भी यही आकर पढ़ते है । यहा की सुबह जहा पंखियो के कलरव से होती है वही यहा की शाम सूरज के डूबने से नही बल्कि मंदिरों की आरती से होती है ।

समय के साथ सफेद पन्नो की चमक धुंधली हो जाती है वैसे ही मेरे गाँव की चमक वक्त के साथ धुंधली होती गई । लोग इस गाँव से धीरे धीरे पलायन करने लगे । कोई नए रोजगार पाने के लिए तो कोई पढ़ाई के लिए तो कोई आधुनिक बनने के लिए अपनी जरूरतों को पूरी करने के लिए शहरों में बसने लगे और इस गाँव के घर मकानों में तब्दील होने लगे और आज वह मकान खंडरो में बदल चुके है । जिस मैदान पर हम खेला करते थे आज उसी मैदान पर सिर्फ और सिर्फ काटो की जाडिया ही देखने को मिलती है । जो घर दोस्तो के हुआ करते थे वहां आज सिर्फ दिवाले रह चुकी है । अब यह गाँव वीराने में तब्दील हो चुका है पर मुझे उम्मीद है जिस तरह परिन्दे आकाश में कितना भी ऊँची उड़ान क्यो न भर ले पर वह एक न एक दिन अपने घर ( घोसला) जरूर लौटते है , उसी तरह हम भी लौटेंगे और यह वीरान सी जगह फिरसे गाँव में तब्दील होगी । फिरसे एक दिन यह मकाने घर में तब्दील होंगे । तब तक के लिए यह गाँव हमारे दिल में बसा रहेगा।

Aryan Suvada

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