Humdard ( poem )

तेरी रूह से है जुडती जो मेरी रूह तक

जो आसमान से जुड़ती ज़मी उस क्षितिज तक

थोड़ा लम्बा सफर हैं जनाब कही हार मत जाना

मंजिल जितनी सुहानी दिखे बस खुश हो जाना

हयात होती ही कुछ खास है, जब लगे मंजिल पास है

वो बन जाती क्षितिज में कही दूर है।

इतना आसान न समजियेगा हयात में छुपे वो इश्क़ को

बड़ी मुश्किल से मिलता है यह इश्क़ जनाब

जो बन जाता है आशिक़ के लिए जिंदगी से भी परे है

जो मिलाता है दर्द से दर्द की रवानी

ऐसे ही इश्क़ की बेजोड़ कहानी

जब समीर कश्ती का दर्द समझ ले

तो क्या मजाल उस सागर की जो इन हमदर्दों को तोड़ पाए

यही है हमारे हमदर्द की कहानी

_Sia

( Team member )

कल शाम 8 बजे हमदर्द episode 1

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