दिल से : शुक्रिया

हैलो दोस्तो ! एक बार फिरसे आपके सामने हाजिर हूं । आज कोई आर्टिक्ल नही बल्कि आप सभी का शुक्रिया अदा करना चाहता हु । सबसे पहले तो में आप सभी पाठकों एवं फ़ॉलोअर्स को तहे दिल से शुक्रिया कहना चाहता हूं ।आपने इतने कम समय में जो मेरी रचनाओं को प्यार दिया और सराहा है इसके लिए आप सभी को तहे दिल से शुक्रिया ।

आज मेरी रचनाओं को जो प्यार और सम्मान आपकी तरफ से मिल रहा है इन रचनाओं को ब्लॉग तक लाने में कई लोगों का हाथ है जिनके नाम में लेना चाहूंगा करण चावड़ा, सिया,मुनाफ फ़ैज़लानी और केतन मियात्रा जो हमेशा मुझे लिखने के लिए प्रेरित करते और मेरी रचना को सुंदर बनाने के लिए नए नए सुजाव देते रहते है । इन लोगों को भी में शुक्रिया कहना चाहूंगा और यह कहना चाहूंगा की इसी तरह हमेशा मेरा साथ देना ।

हर मनुष्य जो काबिल है उसे काबिल बनाने के पीछे कोई न कोई गुरु जरूर होता है जो उनकी क़ाबिलियत को पहचान कर उन्हें दुनिया के सामने काबिल व्यक्ति के रुप में लाता है । मेरे लेखक बनने के पीछे भी कई लोगो का हाथ है जिनमे मेरी माँ जिन्होंने कड़ा संघर्ष करके मुझे पढ़ाया ,मेरी नानी और कઈ अनगिनित लोग है पर मेरे अंदर छुपे हुए लेखक को पहचानकर उसे बहार लाकर तराशने का काम मेरे गुरुजी श्री देसाई सर ने किया और मुझे इस काबिल बनाया की आज मैं अपनी रचनाओं को आप के समक्ष रख सकू । मुझे आज भी याद है जब मुझे लिखना पढ़ना नही आता था तब अखबार एवं पत्रिका में छपी तस्वीरो को देखकर अलग अलग कहानिया बुन लेता था और अपने दोस्तों को कहानिया सुनाता था और दोस्तो की तारीफे बटोरता । और उन्ही तारीफ की लालच ने मुझे स्टोरी टेलर का पद दिलवा दिया और में मेरे साथी वर्ग को भी कहानियां सुनाता था । और जब एक दिन क्लास में भी कहानिया सुना रहा था तब देसाई सर ने मुझे देख लिया और बाद में मिलने को कहा। में डर गया था कि सर कोनसी सजा देंगे पर जब में न चाहते हुए भी उनसे मिलने गया और उन्होंने डाटने के बदले मुझे यह सलाह दी कि जो कहानिया तू बकबक करके कहता है उसी कहानियो को लिखना शुरू कर और उन्होंने मुझे एक नाटक लिखने को दिया और यही से मेरे लेखक बनने का सफर शुरू हुआ । हर रात अरावली हाउस के बहार मेरी लेखक बनने की शिक्षा होती थी प्रेमचंद ,शरतचंद्र ,.झवेरचंद मेघाणी और कई महान लेखको के बारे में बताते थे और उनकी रचना पढ़ने को कहते थे और उसका परिणाम आज आपके सामने है । में अपने गुरुजी को भी दिलसे धन्यवाद कहना चाहूंगा और उनको प्रणाम करना चाहूंगा कि मुझ जैसे तुच्छ मनुष्य के जीवन को आपने राह दिखाई ।

एक और व्यक्ति है जिनका भी बहोत बड़ा हाथ है मेरे लेखक बनने में वे है सुषमा मैडम और पवन सर जिन्होंने मेरे अंदर की कमियों को छांटा और मुझे लिखने के बहोत से गुण सिखाए मैं उन दोनों का भी धन्यवाद करना चाहूँगा।

आशा करता हु जो प्यार आपने मेरी पिछली रचनाओं को दिया है आगे भी मेरी रचना को मिलता रहेगा और आपके समक्ष में और अच्छी रचना लेकर उपस्थित होऊँगा और आप भी मेरे ब्लॉग पर किस प्रकार की रचना पढ़ना चाहते है यह कमेंट के द्वारा अपना सुजाव दीजिये ।

इसी मौके पर मैं आप सब के सामने अपनी पहली कहानी हमदर्द को पेश करने जा रहा हु । यह एक ऐसी प्रेम कहानी है जिसमे कोई बेवफा नही है, न ही समाज और दुनिया के बनाये कानून इनकी मोहब्बत के बीच आते है , तब भी इनकी मोहब्बत गालिब के उस शेर को सार्थक करती है कि

यह इश्क़ नही आसाँ इतना समज लीजिये,

आग का दरिया है और डूब के जाना है।

मोहब्बत हर किसी के नसीब में नही होती क्योंकि मोहब्बत अपने बन्दे खुद चुनती है और हमदर्द ऐसे ही दो बन्दों की कहानी है जिनको चुना तो था इश्क़ ने पर इनकी मोहब्बत इतनी आसाँ नही थी ।

यह कहानी जल्द ही आपके सामने आएगी । यह कहानी लघु उपन्यास में होने के कारण इनको प्रकरण ( एपिसोड ) मैं पब्लिश किया जाएगा ।

एक और गुजारिश

एग्जाम होने के कारण 9 अप्रैल तक कोई भी आर्टिकल कहानी कुछ भी इस ब्लॉग से पोस्ट नही होगा इसके माफी चाहता हु ।

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